उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zulf-e-shab ka saya bhi kis qadar ghanera hai

ज़ुल्फ़-ए-शब का साया भी किस क़दर घनेरा है

زلف شب کا سایہ بھی کس قدر گھنیرا ہے

शायर: Sabir Aarwi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ुल्फ़-ए-शब का साया भी किस क़दर घनेरा है
दिल से उन की महफ़िल तक रास्ता अंधेरा है

आरिज़-ए-तबस्सुम पर ग़ाज़ा-ए-तकल्लुफ़ क्यों
मुस्कुरा के देखो तो हर तरफ़ सवेरा है

शाख़-ए-गुल सी बाहें हों या ख़ुनक हवाएँ हों
ताइर-ए-तख़य्युल का कब कहीं बसेरा है

उन का नाम जब लेंगे दिल ज़रूर धड़केगा
उन की याद का जब तक मेरे दिल में डेरा है

दामन-ए-मोहब्बत में आँसुओं के मोती हैं
या चमन में शबनम ने लाल-ओ-ज़र बिखेरा है

तुम मता-ए-ग़म 'साबिर' जैसे हो बचा लेना
रहज़नों की बस्ती है डाकुओं का डेरा है