उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kunj-e-tanhai ke afkar mein kya rakkha hai

कुंज-ए-तन्हाई के अफ़्कार में क्या रक्खा है

کنج تنہائی کے افکار میں کیا رکھا ہے

शायर: Sabir Aarwi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुंज-ए-तन्हाई के अफ़्कार में क्या रक्खा है
ज़िक्र-ए-ज़ुल्फ़-ओ-लब-ओ-रुख़्सार में क्या रक्खा है

ऐ ग़म-ए-ज़ीस्त तिरा साथ ग़नीमत है मुझे
वर्ना अब सिर्फ़ ग़म-ए-यार में क्या रक्खा है

पहले ही खुल गया इंकार से महफ़िल का भरम
और अब आप के इक़रार में क्या रक्खा है

मर्हबा अज़्म-ए-जवाँ ले के निकलने वालो
इस जहाँ के रसन-ओ-दार में क्या रक्खा है

अपने जब हो न सके ग़ैर की हम सम्त चले
वर्ना इस कूचा-ए-अग़्यार में क्या रक्खा है

कल तलक आप के क़ाबिल था यही दिल 'साबिर'
हाँ मगर इक दिल-ए-बीमार में क्या रक्खा है