उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gham mein jo masarrat ke pahlu nikal aate hain

ग़म में जो मसर्रत के पहलू निकल आते हैं

غم میں جو مسرت کے پہلو نکل آتے ہیں

शायर: Sabir Aarwi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़म में जो मसर्रत के पहलू निकल आते हैं
हम लाख छुपाते हैं आँसू निकल आते हैं

मीआ'द बढ़ाते हैं वो क़ैद-ए-मोहब्बत की
हम बच के असीरान-ए-गेसू निकल आते हैं

क्या रहरव-ए-हस्ती ने फिर राह-ए-तलब खो दी
क्यों शब के अंधेरे में जुगनू निकल आते हैं

जब भी तिरी ज़ुल्फ़ों का चर्चा कहीं होता है
तख़्ईल के गोशे से बा-मू निकल आते हैं

क्यों बरबत-ए-दिल छेड़ें ज़ख़्मों के गुलिस्ताँ में
क्या जानिए क्या गुज़रे जादू निकल आते हैं

'साबिर' ग़म-ए-हस्ती में मायूस न हो जाएँ
हर हाल में जीने के पहलू निकल आते हैं