उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zindagi ke har-nafas ko jaan-e-jaan samjha tha main

ज़िंदगी के हर-नफ़स को जान-ए-जाँ समझा था मैं

زندگی کے ہر نفس کو جان جاں سمجھا تھا میں

शायर: Vahshi Kanpuri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िंदगी के हर-नफ़स को जान-ए-जाँ समझा था मैं
चंद लम्हों को हयात-ए-जाविदाँ समझा था मैं

छूट कर अब क़ैद-ए-रंग-ओ-बू से ये साबित हुआ
वो क़फ़स था जिस को अपना आशियाँ समझा था मैं

मेरा ही अफ़्साना मुज़्मर नाला-ए-बुलबुल में था
जिस को ग़फ़लत से हदीस-ए-दीगराँ समझा था मैं

रंग-ए-रुख़ बेताबी-ए-दिल आह-ए-सर्द-ओ-अश्क-ए-गर्म
सब थे ये ग़म्माज़ जिन को राज़दाँ समझा था मैं

क्या हुआ अश्क-ए-मुसलसल सर्द आहें क्या हुईं
इश्क़ को तो कारवाँ-दर-कारवाँ समझा था मैं