उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dar-parda-e-bahaar jo wo naghma-KHwan na ho

दर-पर्दा-ए-बहार जो वो नग़्मा-ख़्वाँ न हो

در پردۂ بہار جو وہ نغمہ خواں نہ ہو

शायर: Vahshi Kanpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दर-पर्दा-ए-बहार जो वो नग़्मा-ख़्वाँ न हो
बुलबुल से नाला गुल से तबस्सुम अयाँ न हो

ग़व्वास-ए-बहर-ए-इश्क़ न तूफ़ान-ए-ग़म से डर
ये भी शनावरी का तिरी इम्तिहाँ न हो

नाकामी-ए-ख़िरद से मुझे अब ये ख़ौफ़ है
सई-ए-जुनूँ भी मेरी कहीं राएगाँ न हो

ऐसा कोई मक़ाम न अब तक मिला जहाँ
मेरी जबीं हो और तिरा आस्ताँ न हो

उस बे-निशाँ का मिल नहीं सकता कभी सुराग़
जब तक कोई तलाश में ख़ुद बे-निशाँ न हो

मैं भी मिटा चुका हूँ रह-ए-इश्क़ में हयात
मेरा ही ये ग़ुबार पस-ए-कारवाँ न हो

'वहशी' तरीक़-ए-इश्क़ में रुस्वाइयाँ भी हैं
कितना ही दर्द दिल में हो लब पर फ़ुग़ाँ न हो