उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hijab-e-zahir-o-baatin bhi darmiyan mein nahin

हिजाब-ए-ज़ाहिर-ओ-बातिन भी दरमियाँ में नहीं

حجاب ظاہر و باطن بھی درمیاں میں نہیں

शायर: Vahshi Kanpuri5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हिजाब-ए-ज़ाहिर-ओ-बातिन भी दरमियाँ में नहीं
अब इम्तियाज़ कोई मेरे जिस्म-ओ-जाँ में नहीं

भरी बहार में अब के ये माजरा क्या है
कि जुम्बिश आज कोई शाख़-ए-आशियाँ में नहीं

नज़र फ़रेब न हो सेहर-ए-रंग-ओ-बू तो यहाँ
वो क्या बहार है जो पर्दा-ए-ख़िज़ाँ में नहीं

मुसाफ़िरान-ए-'अदम का निशाँ कहाँ ढूँडें
कहीं ग़ुबार भी उस राह-ए-कारवाँ में नहीं

नज़र से 'वहशी'-ए-ख़स्ता के देखिए तो यहाँ
सिवाए दश्त के कुछ और गुल्सिताँ में नहीं