उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zindagi bhi kaisi chaal chal rahi hai

ज़िंदगी भी कैसी चाल चल रही है

زندگی بھی کیسی چال چل رہی ہے

शायर: Zaan Farzaan8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िंदगी भी कैसी चाल चल रही है
ख़ुद को ही गिरा के ख़ुद सँभल रही है

वास्ता हमारा बर्फ़ की तरह था
बर्फ़ ठोस थी पर अब पिघल रही है

क्या बहार ये है ये ख़िज़ाँ के जैसी
तुम ने तो कहा था रुत बदल रही है

क्यों इधर-उधर की बात कर रहा है
कोई तो तुझे भी बात खल रही है

आज-कल भला क्यों बे-सबब ही ख़ुश हूँ
देख ये उदासी हाथ मल रही है

मेरी हर ख़ुशी ही रेत के है मानिंद
रेत हाथ में है और फिसल रही है

क्यों ये फ़िक्र-ए-फ़र्दा इस क़दर है भूकी
आज की भी ख़ुशियाँ क्यों निगल रही है

'ज़ान' बिन डरे ही आतिश-ए-जिगर पे
उस की याद नंगे पाँव चल रही है