उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab se wo mere apne ghairon mein baT gae

जब से वो मेरे अपने ग़ैरों में बट गए

جب سے وہ میرے اپنے غیروں میں بٹ گئے

शायर: Zaan Farzaan9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब से वो मेरे अपने ग़ैरों में बट गए
उम्मीद के तो जैसे बादल ही छट गए

ग़म यूँ तो बाँटने से अब तक बढ़े ही थे
पर संग तेरे बाँटे तो ये भी घट गए

मुश्किल था काम वैसे यूँ भूलना उसे
इस काम से मगर हम कब के निपट गए

इमदाद में तिरी तो हाज़िर बहुत थे ना
तो क्या हुआ अगर हम पीछे भी हट गए

कितने 'अजीब थे वो अपने त'अल्लुक़ात
ख़ुद फैलते गए फिर ख़ुद ही सिमट गए

आए तो थे बहुत से यूँ रास्ते में साथ
मंज़िल थी दूर तो फिर सब ही पलट गए

दिन रात माँगते थे जिस को ख़ुदा से हम
उस के बग़ैर ही फिर दिन रात कट गए

थे मुद्दतों से भूके वो जानवर सभी
सो ज़हर भी परोसा तो सब झपट गए

रख कर यक़ीं ख़ुदा पर कुछ यूँ हुआ कि हम
पीछे नहीं हटे जो इक बार डट गए