उर्दू शायरी · ग़ज़ल

malal tha mili shikast teri chaal se

मलाल था मिली शिकस्त तेरी चाल से

ملال تھا ملی شکست تیری چال سے

शायर: Zaan Farzaan12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मलाल था मिली शिकस्त तेरी चाल से
मगर खुला ये ज़ह्न फिर उसी मलाल से

निकल गया है कब का मेरे दिल से तू मगर
नहीं निकल रहा है क्यों मिरे ख़याल से

मिज़ाज से मिरे तू मेरा हाल भाँप मत
मिरा मिज़ाज मुख़्तलिफ़ है मेरे हाल से

मैं शम्स हूँ कि जिस का है 'उरूज लाज़मी
न रख तू ख़ुद को शाद यूँ मिरे ज़वाल से

था मुद्दतों से ख़ुश्क मेरी ग़फ़लतों से जो
वो फूल खिल उठा है आज देख-भाल से

था ख़ुद के ही क़बील से असद डरा हुआ
वो फँस चुका था 'इश्क़ कर के इक ग़ज़ाल से

हर एक अश्क पोछने को लाख शाने हैं
तुझे है फ़ाएदा बहुत तिरे जमाल से

वो बारहा वही सवाल पूछता रहा
था बारहा गुरेज़ मुझ को जिस सवाल से

वो रुख़्सती के वक़्त मुझ को यूँ लगा था ख़ुश
कि गोया कुछ ख़ुशी न थी उसे विसाल से

वो मिल गया तो उस की अहमियत नहीं रही
मैं जिस का मुंतज़िर रहा था इतने साल से

वो इक नज़र से हल करे सभी के मसअले
गिला नहीं किसी को हुस्न-ए-बे-मिसाल से

गुनह ही कर दिया उसे वो बात कह के 'ज़ान'
सदा वो खाल ही जुदा करे है बाल से