उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zist mein tarikiyan baDhti gain

ज़ीस्त में तारीकियाँ बढ़ती गईं

زیست میں تاریکیاں بڑھتی گئیں

शायर: Gauhar Seema5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ीस्त में तारीकियाँ बढ़ती गईं
लम्हा लम्हा सिसकियाँ बढ़ती गईं

बे-ज़बान जब हो गई ये ज़िंदगी
ज़ेहन में सरगोशियाँ बढ़ती गईं

ख़्वाहिशों के फूल मुरझाने लगे
फिर मिरी ये हिचकियाँ बढ़ती गईं

ज़ख़्म खा कर मुस्कुराते ही रहे
दिल की ये ख़ामोशियाँ बढ़ती गईं

सोचते ही सोचते गुज़रा सफ़र
ख़्वाब की सरमस्तियाँ बढ़ती गईं