उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zarra zarra hai ise mehr-e-munawwar na kaho

ज़र्रा ज़र्रा है इसे मेहर-ए-मुनव्वर न कहो

ذرہ ذرہ ہے اسے مہر منور نہ کہو

शायर: Habab Hashmi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़र्रा ज़र्रा है इसे मेहर-ए-मुनव्वर न कहो
क़तरा हर हाल में क़तरा है समुंदर न कहो

बुत-ए-तन्नाज़ को इख़्लास का पैकर न कहो
दुश्मन-ए-मेहर-ओ-वफ़ा को फ़न-ए-आज़र न कहो

कहीं फूटी है कभी उन से वफ़ा की ख़ुशबू
लब-ए-माशूक़ को औराक़-ए-गुल-ए-तर न कहो

रंग और नस्ल की तफ़रीक़ मिटाने के लिए
मस्लहत है इसे बेहतर उसे कमतर न कहो

ग़म की जब आँच लगेगी तो पिघल जाएगा
दिल तो इक शीशा है इस शीशे को पत्थर न कहो

साथ तक़दीर के तदबीर ज़रूरी है 'हबाब'
बिगड़े हालात को तुम अपना मुक़द्दर न कहो