उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jalwa-gar aaj hai wo mehr-e-munawwar ki tarah

जल्वा-गर आज है वो मेहर-ए-मुनव्वर की तरह

جلوہ گر آج ہے وہ مہر منور کی طرح

शायर: Habab Hashmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जल्वा-गर आज है वो मेहर-ए-मुनव्वर की तरह
बख़्त अपना भी चमकता है सिकंदर की तरह

उस की रफ़्तार है बस मौजा-ए-कौसर की तरह
गुफ़्तुगू में है खनक शीशा-ओ-साग़र की तरह

किस को यारा-ए-सुख़न है उसे हम भी देखें
वो मुख़ातब है मगर दावर-ए-महशर की तरह

क्या ख़बर लोग किसे अपना ख़ुदा कह देंगे
लाख बुत हम ने तराशे तो हैं आज़र की तरह

किस पे इस दौर-ए-पुर-आशोब में तकिया कीजे
राहज़न भी तो नज़र आते हैं रहबर की तरह

मंज़िल-ए-फ़क़्र-ओ-ग़िना क्या है ये हम से पूछो
ज़िंदगी हम ने गुज़ारी है क़लंदर की तरह

कितने तूफ़ान हैं पिन्हाँ कोई देखे तो 'हबाब'
मौजज़न है दिल-ए-शाइ'र भी समुंदर की तरह