उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi hamare liye tegh-e-be-niyam karo

कभी हमारे लिए तेग़-ए-बे-नियाम करो

کبھی ہمارے لئے تیغ بے نیام کرو

शायर: Habab Hashmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी हमारे लिए तेग़-ए-बे-नियाम करो
जो दास्ताँ है तुम्हारी उसे तमाम करो

ख़ुलूस और मोहब्बत से नेक काम करो
ये मय-कदे है सभी को शरीक-ए-जाम करो

जो मय-कदे से निकाले गए तो क्या होगा
मैं मोहतसिब हूँ यहाँ मेरा एहतिराम करो

तुम्हारे क़ुर्ब से दिल को सुकून मिलता है
मिरे क़रीब ही बैठो न कुछ कलाम करो

वो एक शाम कि जिस पर निसार सुब्ह-ए-अज़ल
वो एक शाम कभी तुम हमारे नाम करो

कहाँ नजात की सूरत है क़ैद-ए-हस्ती से
किसी तरह इसी ज़िंदाँ में सुब्ह-ओ-शाम करो

'हबाब' हस्ती-ए-मौहूम का भरोसा क्या
मुसाफ़िरों की तरह बस यहाँ क़याम करो