उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zara nigah uThao ki gham ki raat kaTe

ज़रा निगाह उठाओ कि ग़म की रात कटे

ذرا نگاہ اٹھاؤ کہ غم کی رات کٹے

शायर: Davarka Das Shola6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़रा निगाह उठाओ कि ग़म की रात कटे
नज़र नज़र से मिलाओ कि ग़म की रात कटे

अब आ गए हो तो मेरे क़रीब आ बैठो
दुई के नक़्श मिटाओ कि ग़म की रात कटे

शब-ए-फ़िराक़ है शम-ए-उमीद ले आओ
कोई चराग़ जलाओ कि ग़म की रात कटे

कहाँ हैं साक़ी-ओ-मुत्रिब कहाँ है पीर-ए-हरम
कहाँ हैं सब ये बुलाओ कि ग़म की रात कटे

कहाँ हो मय-कदे वालो ज़रा इधर आओ
हमें भी आज पिलाओ कि ग़म की रात कटे

नहीं कुछ और जो मुमकिन तो यार 'शोला' की
कोई ग़ज़ल ही सुनाओ कि ग़म की रात कटे