उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil-e-be-muddaa ka muddaa kya

दिल-ए-बे-मुद्दआ का मुद्द'आ क्या

دل بے مدعا کا مدعا کیا

शायर: Davarka Das Shola7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल-ए-बे-मुद्दआ का मुद्द'आ क्या
उसे यकसाँ रवा क्या नारवा क्या

जिन्हें हर साँस भी इक मरहला है
उन्हें रास आए दुनिया की हवा क्या

कोई सुनता नहीं है मुफ़लिसों की
ग़रीबों का पयम्बर क्या ख़ुदा क्या

निगाह-ए-दोस्त में जचता नहीं जब
तो फिर मैं क्या मिरा ज़ेहन-ए-रसा क्या

बड़ा अच्छा क्या आज आ गए तुम
चलो छोड़ो न आए कल हुआ क्या

जो ख़ुद दस्त-ए-तलब फैला रहा हो
सखी भी हो तो उस का आसरा क्या

अगर मजबूर है जीने पर इंसाँ
तो फिर कैसे कटे ये सोचना क्या