उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zamin-o-asman ki sari parten chiKH uThti hain

ज़मीन-ओ-आसमाँ की सारी परतें चीख़ उठती हैं

زمین و آسماں کی ساری پرتیں چیخ اٹھتی ہیں

शायर: Nadeem Mahir5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़मीन-ओ-आसमाँ की सारी परतें चीख़ उठती हैं
वो वाहिद लम-यज़ल है सब दलीलें चीख़ उठती हैं

कहानी में मिरी पिन्हाँ अजब सा कर्ब है ग़म है
क़लम ख़ामोश हो जाए तो सतरें चीख़ उठती हैं

गुज़ारूँ किस तरह लम्हे अब इस शहर-ए-ख़मोशाँ में
ज़बूँ-हाली पे अब मेरी फ़सीलें चीख़ उठती हैं

रदीफ़-ओ-क़ाफ़िया की इन दिनों औक़ात ही क्या है
ग़लत हाथों में पड़ जाएँ तो बहरें चीख़ उठती हैं

तलातुम है अजब सा मेरे अंदर आज-कल 'माहिर'
भँवर ख़ामोश होता है तो लहरें चीख़ उठती हैं