उर्दू शायरी · ग़ज़ल

baam-o-dar par rengti parchhaiyan

बाम-ओ-दर पर रेंगती परछाइयाँ

بام و در پر رینگتی پرچھائیاں

शायर: Nadeem Mahir4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बाम-ओ-दर पर रेंगती परछाइयाँ
मुझ से अब मानूस हैं तन्हाइयाँ

अब समुंदर भी बहुत सतही हुए
अब रहीं इन में न वो गहराइयाँ

ख़ाना-ए-दिल को करो आबाद फिर
मुझ को लौटा दो वही रानाइयाँ

इक थकन सी जिस्म पर तारी हुई
टूट कर गिरने लगीं परछाइयाँ