उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zamane mein kahin dil ko lagana bhi zaruri tha

ज़माने में कहीं दिल को लगाना भी ज़रूरी था

زمانے میں کہیں دل کو لگانا بھی ضروری تھا

शायर: श्रेय पुष्ट नहीं6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़माने में कहीं दिल को लगाना भी ज़रूरी था
ग़लत कुछ भी नहीं लेकिन छुपाना भी ज़रूरी था

ग़म-ए-दौराँ में हम को मुस्कुराना भी ज़रूरी था
कि काँटों से हमें दामन बचाना भी ज़रूरी था

ज़माना क्या कहेगा ये नहीं सोचा कभी हम ने
जो था दिल में हमारे वो बताना भी ज़रूरी था

हमें पत्थर भी खाने थे हमें गाली भी खानी थी
मगर दुनिया को आईना दिखाना भी ज़रूरी था

हमें हँसते हुए बस देखता तो रूठ जाता वो
हमें हँसते हुए आँसू बहाना भी ज़रूरी था

न हम सोए न वो सोए न आई नींद दोनों को
मगर जलते चराग़ों को बुझाना भी ज़रूरी था