उर्दू शायरी · ग़ज़ल

haqiqat ka agar afsana ban jae to kya kije

हक़ीक़त का अगर अफ़्साना बन जाए तो क्या कीजे

حقیقت کا اگر افسانہ بن جائے تو کیا کیجے

शायर: श्रेय पुष्ट नहीं5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हक़ीक़त का अगर अफ़्साना बन जाए तो क्या कीजे
गले मिल कर भी वो बेगाना बन जाए तो क्या कीजे

हमें सौ बार तर्क-ए-मय-कशी मंज़ूर है लेकिन
नज़र उस की अगर मय-ख़ाना बन जाए तो क्या कीजे

नज़र आता है सज्दे में जो अक्सर शैख़ साहब को
वो जल्वा जल्वा-ए-जानाना बन जाए तो क्या कीजे

तिरे मिलने से जो मुझ को हमेशा मना करता है
अगर वो भी तिरा दीवाना बन जाए तो क्या कीजे

ख़ुदा का घर समझ रक्खा है अब तक हम ने जिस दिल को
'क़तील' इस में भी इक बुत-ख़ाना बन जाए तो क्या कीजे