उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil ki barbaadi mein shamil thi raza aankhon ki

दिल की बर्बादी में शामिल थी रज़ा आँखों की

دل کی بربادی میں شامل تھی رضا آنکھوں کی

शायर: श्रेय पुष्ट नहीं8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल की बर्बादी में शामिल थी रज़ा आँखों की
इस की पादाश में काम आई ज़िया आँखों की

आँख माहौल से जब तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ कर ले
ग़ौर कीजे तो वो होती है अना आँखों की

ज़ेर-ए-लब मौज-ए-तबस्सुम न 'अरूसाना लिबास
हुस्न-ए-मा'सूम की पहचान हया आँखों की

हाल-ए-दिल लफ़्ज़ों का मुहताज है ये किस ने कहा
कोई समझे तो ये आँसू हैं सदा आँखों की

हम को ले डूबेगा ये ज़ाहिर-ओ-बातिन का तज़ाद
रूह का कर्ब जुदा राह जुदा आँखों की

गौहर-ए-अश्क को अर्ज़ां नहीं करते ये लोग
क़द्र पहचानते हैं अहल-ए-वफ़ा आँखों की

आँखों वालों ने उड़ाया है अँधेरों का मज़ाक़
रौशनी छीन न ले उन से ख़ुदा आँखों की

इस को क्या कहते हैं 'इक़बाल' मैं किस से पूछूँ
हुस्न ख़ुद दाद-तलब और ख़ता आँखों की