उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zaKHm mahsus na ho nind zara aane do

ज़ख़्म महसूस न हो नींद ज़रा आने दो

زخم محسوس نہ ہو نیند ذرا آنے دو

शायर: Vijay Sharma4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ख़्म महसूस न हो नींद ज़रा आने दो
फिर किसी ख़्वाब में मर जाऊँ तो मर जाने दो

कितना लम्बा है सफ़र ख़ुद से गुज़र होने का
थक चुका हूँ मैं कहीं चैन से सो जाने दो

मैं बहुत दूर से आया हूँ इक उम्मीद लिए
बैठने मत दो मगर नाम तो बतलाने दो

फिर शब-ए-वस्ल कुछ इस तौर से आबाद हुई
जैसे मिलने को हुए दश्त के वीराने दो