उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab kahan dard jism-o-jaan mein hai

अब कहाँ दर्द जिस्म-ओ-जान में है

اب کہاں درد جسم و جان میں ہے

शायर: Vijay Sharma6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब कहाँ दर्द जिस्म-ओ-जान में है
दफ़्न है दिल बदन दुकान में है

दिन ढले रोज़ यूँ लगे जैसे
कोई मुझसा मिरे मकान में है

दिल का कुछ भी पता नहीं चलता
हाथ में है कि आसमान में है

छाँव के पल जला दिए सारे
उफ़ वो सूरज जो साएबान में है

क्यूँ न तश्बीह फूल हो उस की
वो जो ख़ुशबू सा दास्तान में है

इक सवाल और 'अर्श' बाक़ी है
आख़िरी तीर भी कमान में है