उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zaKHm dikhane lag jati hai jaan ko aane lag jati hai

ज़ख़्म दिखाने लग जाती है जान को आने लग जाती है

زخم دکھانے لگ جاتی ہے جان کو آنے لگ جاتی ہے

शायर: Iftikhar Haidar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ख़्म दिखाने लग जाती है जान को आने लग जाती है
रात गए तन्हाई जिस दम शोर मचाने लग जाती है

इश्क़ दिमाग़ की चक्कर बाज़ी हुस्न सरासर दीद का धोका
दिल को ये सब कहते कहते उम्र ठिकाने लग जाती है

उस शर्मीली सी लड़की से जब भी दिल की हालत पूछी
सीधी बात नहीं करती है नज़्म सुनाने लग जाती है

रात को महरम-ए-राज़ समझ कर रात से राज़ की बात कहो तो
रात कहाँ चुप रह पाती है बात बढ़ाने लग जाती है

अंदर के हालात को बाहर की दुनिया से लाख छुपाएँ
वहशत घर की भेदी बन कर लंका ढाने लग जाती है