उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zaif ruh hui par badan Dhala ki nahin

ज़ईफ़ रूह हुई पर बदन ढला कि नहीं

ضعیف روح ہوئی پر بدن ڈھلا کہ نہیں

शायर: Vijay Sharma5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ईफ़ रूह हुई पर बदन ढला कि नहीं
के तेरे देस तेरा रास्ता बना कि नहीं

हैं अपनी ज़ात के मुनकिर ज़मीन-ओ-आब भी क्या
उदास रंग शजर का हरा हुआ कि नहीं

ये बहस छोड़ के कितनी हसीन है दुनिया
तू ये बता कि तेरा दिल कहीं लगा कि नहीं

मैं ख़ुद से रूठ के दुनिया का हो चुका था मगर
वो मुझ को छोड़ के अपना भी हो सका कि नहीं

नहीं वो हाल के एहसास-ए-नौ बरत पाऊँ
तू फ़ासले ही से मुझ को संभाल आ कि नहीं