उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zaban-e-mai-kada mein jis ko mai-kash jam kahte hain

ज़बान-ए-मय-कदा में जिस को मय-कश जाम कहते हैं

زبان مے کدہ میں جس کو مے کش جام کہتے ہیں

शायर: Ehsan Darbhangavi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़बान-ए-मय-कदा में जिस को मय-कश जाम कहते हैं
उसे हम अपने दिल का दूसरा इक नाम कहते हैं

हदीस-ए-ज़ुल्फ़-ओ-रुख़ क्या हाल सुब्ह-ओ-शाम कहते हैं
ग़म-ए-जानाँ के पर्दे में ग़म-ए-अय्याम कहते हैं

तबस्सुम ने कही थी दास्ताँ आग़ाज़-ए-उल्फ़त की
सुनो अब आँसुओं से क़िस्सा-ए-अंजाम कहते हैं

तुम्हारी अँखड़ियों में है सहर गंगा के साहिल की
मगर मय-ख़्वार उस को मय-कदे की शाम कहते हैं

तिरी ज़ुल्फ़-ए-सियह से ख़ाल-ए-रुख़ का जो भी रिश्ता हो
असीरान-ए-मोहब्बत दाना ज़ेर-ए-दाम कहते हैं

तिरे दर्द-ए-मोहब्बत को ज़माना इक मरज़ कह ले
मगर हम तो इलाज-ए-गर्दिश-ए-अय्याम कहते हैं

दिल-ए-अफ़सुर्दा को 'एहसान' तुम शम'-ए-सहर कह लो
मगर अहबाब तो इस को चराग़-ए-शाम कहते हैं