उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bana ke apne safine ka naKHuda mujhko

बना के अपने सफ़ीने का नाख़ुदा मुझ को

بنا کے اپنے سفینے کا ناخدا مجھ کو

शायर: Ehsan Darbhangavi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बना के अपने सफ़ीने का नाख़ुदा मुझ को
किसी ने कर दिया तूफ़ाँ से आश्ना मुझ को

मैं एक संग-ए-सर-अफ़्गंदा तू है संग-तराश
सुतून-ए-का'बा बना या सनम बना मुझ को

मैं ख़ुद-ग़रज़ हूँ किसी का नहीं हूँ अपने सिवा
ज़माना है कि समझता है आश्ना मुझ को

तुम्हारा शहर गुलिस्ताँ सही मगर इस में
मिले हैं ख़ून के धब्बे भी जा-ब-जा मुझ को

मैं ज़िंदगी से बहुत कुछ मुतालबा करता
तिरी निगाह ने ख़ामोश कर दिया मुझ को

निगाह-ए-शौक़ ही बेहतर है इल्तिजा के लिए
ज़बाँ खुलेगी तो समझेंगे वो गदा मुझ को

वो बद-नसीब मुसाफ़िर हूँ राह-ए-हस्ती का
न राहज़न ही मयस्सर न रहनुमा मुझ को

गिला नहीं मुझे 'एहसाँ' तही सही दामन
ये कम नहीं कि मिला दस्त-ए-बे-दुआ मुझ को