उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi tasawwur mein aa rahi ho kabhi taKHayyul pe chha rahi ho

कभी तसव्वुर में आ रही हो कभी तख़य्युल पे छा रही हो

کبھی تصور میں آ رہی ہو کبھی تخیل پہ چھا رہی ہو

शायर: Ehsan Darbhangavi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी तसव्वुर में आ रही हो कभी तख़य्युल पे छा रही हो
मिरे शबिस्तान-ए-आरज़ू को निगार-ख़ाना बना रही हो

रह-ए-वफ़ा में क़दम क़दम पर नई नई शर्त ला रही हो
ये किस ने बहका दिया है तुम को ये क्या शगूफ़े खिला रही हो

ये ख़ुद-परस्ती-ए-नारवा है ये बेवफ़ाई की इंतिहा है
तुम्हारी ख़ातिर जो लुट चुका है उसी से आँखें चुरा रही हो

बिगाड़ में इक बनाव सा है लगावटों में खिचाव सा है
दिया उमीदों का मेरे दिल में जला रही हो बुझा रही हो

फ़ज़ा भी ना-साज़ है जहाँ की वहाँ वफ़ा साँस लेगी क्यूँकर
हवा भी ग़म्माज़ है जहाँ की वहाँ मुझे क्यों बुला रही हो

अगरचे सहरा-ए-ज़िंदगी में कोई मिरा हम-सफ़र नहीं है
मगर ये महसूस हो रहा है कि तुम मिरे साथ आ रही हो

फिर आज याद उन की आ रही है मगर इस अंदाज़ से कि 'एहसाँ'
उरूस-ए-नौ जैसे पहली शब में बदन को अपने चुरा रही हो