उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zaban aur KHanjar samajhne lage hain

ज़बाँ और ख़ंजर समझने लगे हैं

زباں اور خنجر سمجھنے لگے ہیں

शायर: Deenbandhu Jaiswal5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़बाँ और ख़ंजर समझने लगे हैं
कि चेहरों में अंतर समझने लगे हैं

हमें जब से आँखों से धोका मिला है
इशारे बराबर समझने लगे हैं

नहीं देना नालों को तरजीह इतना
ये ख़ुद को समुंदर समझने लगे हैं

न मम्मी की लोरी न दादी के क़िस्से
मकानों को क्यों घर समझने लगे हैं

ग़रीबी ने हम को तो समझाया यूँ है
समझते नहीं पर समझने लगे हैं