उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zat ka apni eatibar gaya

ज़ात का अपनी ए'तिबार गया

ذات کا اپنی اعتبار گیا

शायर: Om Krishn Rahat9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ात का अपनी ए'तिबार गया
एक बाज़ी मैं और हार गया

नाख़ुदा कश्ती-ए-मोहब्बत का
किस भँवर में मुझे उतार गया

कैसे छोड़ा है उस ने तीर-ए-नज़र
दिल में अटका न दिल के पार गया

अब के भी पिछले साल की मानिंद
यूँही ये मौसम-ए-बहार गया

जाम-ए-लबरेज़ मुझ तक आते ही
ज़ेहन का मेरे ख़लफ़िशार गया

मैं ने घबरा के सी लिया दामन
दाओ मैं जीत के भी हार गया

आश्ती हो गई गरेबाँ से
हाथ से ये भी कारोबार गया

ख़ुल्द की अव्वलीं बग़ावत पर
ध्यान मेरा भी बार बार गया

आज फिर आ गए हैं वो 'राहत'
आज फिर लुत्फ़-ए-इंतिज़ार गया