उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dawar-e-hashr zara aur baDhe baat ki bas

दावर-ए-हश्र ज़रा और बढ़े बात कि बस

داور حشر ذرا اور بڑھے بات کہ بس

शायर: Om Krishn Rahat5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दावर-ए-हश्र ज़रा और बढ़े बात कि बस
मुझ से कुछ और भी पूछेंगे सवालात कि बस

जिस को सुन कर कभी ख़ुश होते हो नाराज़ कभी
आप फ़रमाएँ कि दोहराऊँ वही बात कि बस

क्या मैं अब छोड़ दूँ यारब यहीं उम्मीद का साथ
क्या अभी और ठहर सकती है ये रात कि बस

ज़िंदगी क्या इसी उलझन में गुज़र जाएगी
क्या अभी और भी बिगड़ेंगे ये हालात कि बस

ये क़यामत की घड़ी सर से टलेगी यारब
हैं दिखाने को अभी और कमालात कि बस