उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dukh bhi sahe alam bhi sahe ranj bhi sahe

दुख भी सहे अलम भी सहे रंज भी सहे

دکھ بھی سہے الم بھی سہے رنج بھی سہے

शायर: Om Krishn Rahat6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दुख भी सहे अलम भी सहे रंज भी सहे
फिर भी बशर ख़ुदा को ख़ुदा मानता रहे

सब मुनहसिर बशर पे है वो किस तरह रहे
दुख ज़िंदगी के हम ने तो हँस-खेल कर सहे

दर आ गई है ज़ेहन-ए-बशर में ये सोच क्या
दरिया सुखों का उस के ही घर की तरफ़ बहे

आँगन का उस के पेड़ फलों से लदा भी हो
साया भी उस का घर ही की दीवार तक रहे

झेली हो जिस ने ज़िंदगी ले ले के तेरा नाम
तुझ को अगर ख़ुदा न कहे वो तो क्या कहे

'राहत' मिलेंगे और भी कुछ क़द्र-दान-ए-ज़ीस्त
देखा तो कीजे ख़ुद से भी हट कर गहे गहे