उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zalim se mustafa ka amal chahte hain log

ज़ालिम से मुस्तफ़ा का 'अमल चाहते हैं लोग

ظالم سے مصطفیٰ کا عمل چاہتے ہیں لوگ

शायर: Ejaz Rahmani9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ालिम से मुस्तफ़ा का 'अमल चाहते हैं लोग
सूखे हुए दरख़्त से फल चाहते हैं लोग

काफ़ी है जिन के वास्ते छोटा सा इक मकाँ
पूछे कोई तो शीश-महल चाहते हैं लोग

साए की माँगते हैं रिदा आफ़्ताब से
पत्थर से आइने का बदल चाहते हैं लोग

कब तक किसी की ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ का तज़्किरा
कुछ अपनी उलझनों का भी हल चाहते हैं लोग

बार-ए-ग़म-ए-हयात से शाने हुए हैं शल
उक्ता के ज़िंदगी से अजल चाहते हैं लोग

रखते नहीं निगाह तक़ाज़ों पे वक़्त के
तालाब के बग़ैर कँवल चाहते हैं लोग

जिस को भी देखिए है वही दुश्मन-ए-सुकूँ
क्या दौर है कि जंग-ओ-जदल चाहते हैं लोग

दरकार है नजात ग़म-ए-रोज़गार से
मिर्रीख़ चाहते हैं न ज़ुहल चाहते हैं लोग

'ए'जाज़' अपने अहद का मैं तर्जुमान हूँ
मैं जानता हूँ जैसी ग़ज़ल चाहते हैं लोग