उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yun samaya hai ki ab sar se nikalne ka nahin

यूँ समाया है कि अब सर से निकलने का नहीं

یوں سمایا ہے کہ اب سر سے نکلنے کا نہیں

शायर: Ehtisham Hasan9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यूँ समाया है कि अब सर से निकलने का नहीं
मैं जो चाहूँ भी तो इक डर से निकलने का नहीं

मैं ने जो ख़ौफ़ पिरोया था रगों में अपनी
ऐसा बैठा है कि अंदर से निकलने का नहीं

बा'द कोशिश के नतीजा ये निकाला मैं ने
ज़िंदगी मैं तिरे चक्कर से निकलने का नहीं

खींच लाते हैं हक़ीक़त में हवादिस वर्ना
आदमी ख़्वाब के मेहवर से निकलने का नहीं

सर पटख़ता नहीं पिंजरे में परिंदा यूँही
शौक़-ए-परवाज़ कभी पर से निकलने का नहीं

इक सड़क और मिरा आठवाँ दसवाँ चक्कर
और मुझे 'इल्म है वो घर से निकलने का नहीं

अपने अंदर यूँ छुपाए हैं सनम पत्थर ने
बुत कोई तेशा-ए-आज़र से निकलने का नहीं

ग़म-ए-दौराँ भी है यूँ जैसे मिरा यौम-ए-हिसाब
मैं तो दुनिया में भी महशर से निकलने का नहीं

धोंस देता है ये सूरज मुझे हर शाम 'हसन'
वो जो डूबा तो समुंदर से निकलने का नहीं