उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kahin charagh bujhana paDa ki main bhi hun

कहीं चराग़ बुझाना पड़ा कि मैं भी हूँ

کہیں چراغ بجھانا پڑا کہ میں بھی ہوں

शायर: Ehtisham Hasan9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कहीं चराग़ बुझाना पड़ा कि मैं भी हूँ
कहीं पे ख़ुद को जलाना पड़ा कि मैं भी हूँ

मेरे गले में जो डाला मेरे हरीफ़ों ने
मुझे वो ढोल बजाना पड़ा कि मैं भी हूँ

तिरी अता वो तजस्सुस है जिस के बढ़ने पर
तुझे भी तूर पे आना पड़ा कि मैं भी हूँ

वो बार बार मुझे भूलता था और मुझे
ये बार-बार बताना पड़ा कि मैं भी हूँ

सुना था आएँगे महफ़िल में दिल-दरीदा लोग
मुझे भी ज़ख़्म दिखाना पड़ा कि मैं भी हूँ

वहाँ पे ख़ुद को दिखाया जहाँ मैं था ही नहीं
कहीं ये सच भी छुपाना पड़ा कि में भी हूँ

मैं मानता हूँ कि ख़ामोश है मगर वो है
मुझे तो शोर मचाना पड़ा कि मैं भी हूँ

हुआ नहीं तो भी साबित करूँगा होने को
अगर यक़ीन दिलाना पड़ा कि मैं भी हूँ

'हसन' है इतना ज़रूरी वजूद का इज़हार
हवा को पेड़ हिलाना पड़ा कि मैं भी हूँ