उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mashware par na kahin dhup ke chalne lag jaen

मशवरे पर न कहीं धूप के चलने लग जाएँ

مشورے پر نہ کہیں دھوپ کے چلنے لگ جائیں

शायर: Ehtisham Hasan7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मशवरे पर न कहीं धूप के चलने लग जाएँ
आदमी मोम बनें और पिघलने लग जाएँ

जैसे माहौल बदल देती है मुस्कान तिरी
पैरहन देख के मौसम न बदलने लग जाएँ

इस क़दर बुग़्ज़ दिलों में है कि मा'लूम नहीं
लोग कब किस के लिए ज़हर उगलने लग जाएँ

देख कर रौनक़-ए-बाज़ार में बच्चों का सब्र
अब ये ख़तरा है खिलौने न मचलने लग जाएँ

हम भी गुलशन से निकल जाएँगे ख़ामोशी से
नए पौदे तो ज़रा फूलने फलने लग जाएँ

मौत है भूक है कर्तब है कि क्या है जब लोग
दो सुतूनों से बंधी तार पे चलने लग जाएँ

तुम बताना कि 'हसन' ख़्वाब नहीं सच है ये
हम तुम्हें देख के जब आँख मसलने लग जाएँ