उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hue jis ishq ke mahsur jaane hi nahin deta

हुए जिस इश्क़ के महसूर जाने ही नहीं देता

ہوئے جس عشق کے محصور جانے ہی نہیں دیتا

शायर: Ehtisham Hasan7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हुए जिस इश्क़ के महसूर जाने ही नहीं देता
हमें ख़ुद से ज़ियादा दूर जाने ही नहीं देता

मिज़ाजन इब्तिदा से हम असीर-ए-दश्त-ए-हिजराँ हैं
जहाँ से अब दिल-ए-मजबूर जाने ही नहीं देता

ये लुतफ़-इशक़ ऐसा है लिपट जाता है पैरों से
कोई सरमद हो या मंसूर जाने ही नहीं देता

जहाँ बेचैन फिरते हैं उजाले माँगने वाले
अंधेरा उस जगह तक नूर जाने ही नहीं देता

हमें दरकार है रुख़्सत ग़म-ए-दौराँ से कुछ दिन की
वो अर्ज़ी कर के ना-मंज़ूर जाने ही नहीं देता

अजब सुर्मा बनाया है तिरी ज़र्ब-ए-तजल्ली ने
मिरी आँखों से कोह-ए-तूर जाने ही नहीं देता

फ़ज़ाओं में वफ़ा और ख़ाक में इतनी मोहब्बत है
कहाँ जाऊँ बहावलपूर जाने ही नहीं देता