उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye rang tere shahr ke sahra mein kahan hain

ये रंग तिरे शहर के सहरा में कहाँ हैं

یہ رنگ ترے شہر کے صحرا میں کہاں ہیں

शायर: Hafeez Shahid7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये रंग तिरे शहर के सहरा में कहाँ हैं
गलियाँ हैं न कूचे हैं मकीं हैं न मकाँ हैं

आँखों में छुपा रक्खे हैं अश्कों के ख़ज़ीने
हम ग़म की इनायात से महरूम कहाँ हैं

झलकेंगे किसी रोज़ यही लफ़्ज़-ओ-बयाँ में
आईना-ए-एहसास में जो अक्स निहाँ हैं

रखते हैं जो मुख़्तारी-ए-इंसाँ की तमन्ना
मजबूरी-ए-इंसाँ पे अभी अश्क-फ़िशाँ हैं

आँखों में कोई मौज-ए-शफ़क़-रंग नहीं क्यों
दिल में तो अभी ख़ून के दरिया से रवाँ हैं

तख़्लीक़-ए-मुसव्विर को ज़रा ग़ौर से देखो
रंगों के तनासुब में कई रंग निहाँ हैं

क्या काम हमें माल-ओ-ज़र-ओ-सीम से 'शाहिद'
हम अहल-ए-सुख़न अहल-ए-क़लम अहल-ए-ज़बाँ हैं