उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab kya kahen jo mausam-e-gulshan ka haal hai

अब क्या कहें जो मौसम-ए-गुलशन का हाल है

اب کیا کہیں جو موسم گلشن کا حال ہے

शायर: Hafeez Shahid7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब क्या कहें जो मौसम-ए-गुलशन का हाल है
फूलों से राब्ता न सबा का ख़याल है

हर आरज़ू की आँख में आँसू लहू के हैं
किस का ये दिल के शहर में यौम-ए-विसाल है

मुझ को किया था क़ैदी-ए-तक़दीर किस लिए
क़ुदरत से इंतिज़ार-ए-जवाब-ओ-सवाल है

जज़्बों की अंजुमन में उसी की है रौशनी
गुल-हा-ए-आरज़ू में उसी का जमाल है

जो बुख़्ल से किया है इकट्ठा तमाम उम्र
तेरा नहीं है वो तिरे बेटों का माल है

हर गोशा-ए-ज़मीं पे ज़रा ग़ौर से पढ़ो
लिक्खी जो दास्तान-ए-उरूज-ओ-ज़वाल है

'शाहिद' वो पूछते हैं मिरा हाल क्या कहूँ
जैसा था पिछले साल वही अब के साल है