उर्दू शायरी · ग़ज़ल

be-irada kucha-e-qatil mein jaana paD gaya

बे-इरादा कूचा-ए-क़ातिल में जाना पड़ गया

بے ارادہ کوچۂ قاتل میں جانا پڑ گیا

शायर: Hafeez Shahid7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बे-इरादा कूचा-ए-क़ातिल में जाना पड़ गया
फिर हमें अपना मुक़द्दर आज़माना पड़ गया

क्या करोगे जब कभी शहर-ए-तमन्ना में तुम्हें
हम से बे-आबाद लोगों को बसाना पड़ गया

अपने बिगड़े ख़ाल-ओ-ख़द को आइने में देख कर
आइना इक आइना-गर को दिखाना पड़ गया

देख कर उस का रवय्या ख़ुद बुझाया था जिसे
वो चराग़-ए-आरज़ू फिर से जलाना पड़ गया

हिद्दत-ए-जज़्बात से जलने लगा था तन-बदन
फिर थपक कर इन शरारों को सुलाना पड़ गया

क्या कहें हम मौसमों के देवता को किस लिए
दश्त-ओ-सहरा में बगूलों को सजाना पड़ गया

देखना अहल-ए-चमन 'शाहिद' बुलाएँगे हमें
जब चमन को बाद-ए-सर-सर से बचाना पड़ गया