उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye rang hai to kahan zabt ka rahega bharam

ये रंग है तो कहाँ ज़ब्त का रहेगा भरम

یہ رنگ ہے تو کہاں ضبط کا رہے گا بھرم

शायर: Raaz Muradabadi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये रंग है तो कहाँ ज़ब्त का रहेगा भरम
न अब वो नाज़-ए-तग़ाफ़ुल न मुझ पे जौर-ओ-सितम

ये शाख़-ए-गुल है कि दिल की जराहतों का अलम
हर एक गुल नज़र आता है ज़ख़्म-ए-बे-मरहम

ग़ुबार-ए-राह कहीं है न कोई नक़्श-ए-क़दम
अभी अभी तो यहीं थे मुसाफ़िरान-ए-अदम

अब आ गए हैं तो आदाब-ए-मय-कशी की क़सम
बस एक जाम-ए-रिफ़ाक़त जनाब-ए-शैख़-ए-हरम

उठा था कौन ये मीना-बदोश-ओ-जाम-ब-कफ़
कि आज टूट के बरसा है अब्र-ए-बे-मौसम

कभी हया ने कभी किब्र-ए-हुस्न ने रोका
रही तो उन की तवज्जोह इधर मगर कम-कम

मगर है फ़ितरत-ए-इंसाँ में आज़री पिन्हाँ
तराशता है हर इक शख़्स ख़्वाहिशों के सनम

उन्हें भी तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का 'राज़' ग़म है मगर
बढ़ेगी बात अगर हो गई वो आँख भी नम