उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye kamra kyon paraganda paDa hai

ये कमरा क्यों परागंदा पड़ा है

یہ کمرہ کیوں پراگندہ پڑا ہے

शायर: Faizan Asad8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये कमरा क्यों परागंदा पड़ा है
मकीं पर कौन सा दौरा पड़ा है

दिखाई क्यों नहीं देती सदाक़त
ये कैसा आँख पर पर्दा पड़ा है

नसब से कुछ नहीं होता है प्यारे
सभी के पास इक शजरा पड़ा है

गया है छोड़ कर कोई उदासी
पस-ए-आईना इक चेहरा पड़ा है

मोहब्बत हो गई है बे-इरादा
गले यूँ जान का ख़तरा पड़ा है

बना है जिस के हाथों से समुंदर
तन-ए-तन्हा वही क़तरा पड़ा है

मसीहा कह रही थी जिस को दुनिया
वो देखो आज ख़ुद मुर्दा पड़ा है

ख़ुदाया रहम 'असअद' की ख़ता पर
तिरे दर पर किए सज्दा पड़ा है