उर्दू शायरी · ग़ज़ल

darogh-goi ki fitrat ko aag lag jae

दरोग़-गोई की फ़ितरत को आग लग जाए

دروغ گوئی کی فطرت کو آگ لگ جائے

शायर: Faizan Asad9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दरोग़-गोई की फ़ितरत को आग लग जाए
तुम्हारी दोग़ली सूरत को आग लग जाए

न जाने कितने ही लोगों को मार डाला है
ख़ुदा करे कि मोहब्बत को आग लग जाए

फ़क़ीर-ए-शहर को फ़ाक़ा-कशी ने मार दिया
अमीर-ए-शहर की दौलत को आग लग जाए

कहीं मिले जो वफ़ा तो ख़रीद कर रख लो
न जाने कब यहाँ क़ीमत को आग लग जाए

मआल-ए-ख़ुफ़तगी देखो ये क़ौम चीख़ रही
ज़हीन फ़िक्र की ग़फ़लत को आग लग जाए

हक़ीर समझे सभी को ज़लील करता फिरे
अना-परस्त की शोहरत को आग लग जाए

बदल सके न अदावत को जो उख़ुव्वत से
तो ऐसे लोगों की सोहबत को आग लग जाए

छुपा हो मक़्सद-ए-शोहरत अगर भलाई में
तो ऐसी इज़्ज़त-ओ-शोहरत को आग लग जाए

फ़िराक़-ए-जानाँ से 'असअद' का दिल हुआ छलनी
दुआ-ए-दिल है कि हिजरत को आग लग जाए