उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye jo virane mein baiTha hua hai

ये जो वीराने में बैठा हुआ है

یہ جو ویرانے میں بیٹھا ہوا ہے

शायर: Fahmi Badayuni8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये जो वीराने में बैठा हुआ है
किसी आवाज़ से बिछड़ा हुआ है

तलाफ़ी इस की तन्हाई से होगी
तिरी महफ़िल में जो घाटा हुआ है

कहाँ तक मिट्टी समझौते कराए
हमारा चाक से झगड़ा हुआ है

लचक थी ही नहीं गर्दन में अपनी
बड़ी मुश्किल से इक सज्दा हुआ है

मुझे पीना है जिस कूज़े में पानी
अभी वो चाक पे रक्खा हुआ है

सजाता रहता हूँ जो शा'इरी में
वो सब कुछ आप का फेंका हुआ है

अँधेरी रात है और एक जुगनू
फ़ज़ा में दूर तक फैला हुआ है

पलेगी किस तरह नस्ल-ए-मुसन्निफ़
किताबों में यही लिक्खा हुआ है