उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye jo bazar mein phaile hue hain

ये जो बाज़ार में फैले हुए हैं

یہ جو بازار میں پھیلے ہوئے ہیں

शायर: Fahmi Badayuni8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये जो बाज़ार में फैले हुए हैं
सब अपने कमरों में सिमटे हुए हैं

दिखा सकते हैं दानाओं को रस्ता
मियाँ हम 'इश्क़ में अंधे हुए हैं

तिरा बाज़ार कैसे छोड़ जाएँ
यहीं महँगे यहीं सस्ते हुए हैं

तिरी कॉपी किताबों की बदौलत
मिरे पर्चे बहुत अच्छे हुए हैं

तुम्हारी आँखों ने कुछ कह दिया है
तमन्नाओं के मुँह फूले हुए हैं

कहीं ठोकर न लग जाए ज़मीं पर
सितारे ज़ेहन में रक्खे हुए हैं

बनाते रहते हैं जन्नत के नक़्शे
तिरी गलियों में जो भटके हुए हैं

वो प्याले हों कि मटके हों कि कूज़े
सभी इक चाक से उतरे हुए हैं