उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye har ek shaKHs ke apne tasawwur aur guman tak hai

ये हर इक शख़्स के अपने तसव्वुर और गुमाँ तक है

یہ ہر اک شخص کے اپنے تصور اور گماں تک ہے

शायर: Om Prakash Laghar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये हर इक शख़्स के अपने तसव्वुर और गुमाँ तक है
किसे मालूम है वर्ना हद-ए-इरफ़ाँ कहाँ तक है

हमें तो देखना है हिम्मत-ओ-जुरअत कहाँ तक है
हमारी ज़िंदगी वर्ना फ़क़त ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ तक है

जुनून-ए-इश्क़ में आह-ओ-फ़ुग़ाँ शिकवा गिला कैसा
अगर है भी तो वो आख़िर हमारे मेहरबाँ तक है

जुनूँ की वुसअ'तों का कोई अंदाज़ा न कर पाया
रसाई अक़्ल-ए-इंसाँ की फ़क़त सूद-ओ-ज़ियाँ तक है

क़दम चलने से क़ासिर हैं अँधेरी रात है सर पर
बता दे काश ये कोई मुझे चलना कहाँ तक है

किसी भी आस्ताँ पर अब ख़ुदी जाने नहीं देती
हमारी इल्तिजा तो मालिक-ए-कौन-ओ-मकाँ तक है

हमेशा अहल-ए-दिल ही वक़्त के धारे बदलते हैं
जो बुज़दिल हैं रसाई उन की बस आह-ओ-फ़ुग़ाँ तक है

पस-ए-मुर्दन कोई भी नाम तक उन का नहीं लेता
जो समझे थे हमारा तज़्किरा रहते जहाँ तक है

बहार-ए-गुल्सिताँ तो है ख़ुदा के हाथ ऐ 'लाग़र'
बस इक फ़र्ज़-ए-निगहबानी निगाह-ए-बाग़बाँ तक है