उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dair-o-kaba ki azmat musallam magar

दैर-ओ-काबा की अज़्मत मुसल्लम मगर

دیر و کعبہ کی عظمت مسلم مگر (ردیف .. ے)

शायर: Om Prakash Laghar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दैर-ओ-काबा की अज़्मत मुसल्लम मगर
मय-कदा भी ख़ुदा ही के घर सा लगे

चाँद तारों की जो दे रहा है ख़बर
देखने में तो वो बे-ख़बर सा लगे

गुमरही में भी दीवाना-ए-दिल-फ़िगार
मंज़िल-ए-होश का राहबर सा लगे

ये जहाँ रश्क-ए-जन्नत है किस के लिए
और किसी को यही दर्द-ए-सर सा लगे

झील में अध-खिले फूल पर चाँदनी
हम को मंज़र ये तेरी नज़र सा लगे

शम-ए-बज़्म-ए-अदब था वो कल तक मगर
आज 'लाग़र' चराग़-ए-सहर सा लगे