उर्दू शायरी · ग़ज़ल

chha gaya mustaqilan shab ka andhera shayad

छा गया मुस्तक़िलन शब का अंधेरा शायद

چھا گیا مستقلاً شب کا اندھیرا شاید

शायर: Om Prakash Laghar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

छा गया मुस्तक़िलन शब का अंधेरा शायद
अब न होगा कभी बस्ती में सवेरा शायद

हाँ अभी वक़्त है कुछ फ़ैज़ उठाए कोई
फिर न हो पाएगा उस जोगी का फेरा शायद

नाग बे-ख़ौफ़-ओ-ख़तर फिरते हैं कूचा कूचा
बस्तियों में नहीं अब कोई सपेरा शायद

मालिक-ए-कौन-ओ-मकाँ का जो करम है सब पर
उस की नज़रों में नहीं तेरा कि मेरा शायद

ख़ेमा-ज़न रंज-ओ-अलम यूँ हैं मिरे सीने में
ज़िंदगी भर न उठाएँगे ये डेरा शायद

नींद को छोड़ कर अब फ़िक्र-ए-सफ़र कर 'लाग़र'
कूच करने को है अब तेरा भी डेरा शायद