उर्दू शायरी · ग़ज़ल

andhere ka aalam abhi tak wahi hai

अंधेरे का आलम अभी तक वही है

اندھیرے کا عالم ابھی تک وہی ہے

शायर: Om Prakash Laghar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अंधेरे का आलम अभी तक वही है
सहर के उजाले में भी तीरगी है

वो ला-इल्म हम से भी निकला ज़ियादा
जो कहता था हासिल मुझे आगही है

डरा कर मसाइब से मुझ को न रोको
मिरी मुंतज़िर कब से मंज़िल खड़ी है

सर-ए-शाम दीपक बुझाओ न यारो
शब-ए-तार अपने सरों पर खड़ी है

भरोसा न रख तू किसी राहबर पर
इसी में मुसाफ़िर तिरी बेहतरी है

ख़ताएँ बहुत उस से सरज़द हुई हैं
ये 'लाग़र' फ़रिश्ता नहीं आदमी है