उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye ghanimat hai ki un aankhon ne pahchana hamein

ये ग़नीमत है कि उन आँखों ने पहचाना हमें

یہ غنیمت ہے کہ ان آنکھوں نے پہچانا ہمیں

शायर: Parveen Shakir8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये ग़नीमत है कि उन आँखों ने पहचाना हमें
कोई तो समझा दयार-ए-ग़ैर में अपना हमें

वस्ल में तेरे ख़राबे भी लगें घर की तरह
और तेरे हिज्र में बस्ती भी वीराना हमें

वो कि जिन के हाथ में तक़दीर-ए-फ़स्ल-ए-गुल रही
दे गए सूखे हुए पत्तों का नज़राना हमें

सच तुम्हारे सारे कड़वे थे मगर अच्छे लगे
फाँस बन कर रह गया बस एक अफ़्साना हमें

जिन की ख़ातिर कश्तियाँ हम ने जला डालीं तमाम
अब वही कम-माएगी का दे गए ता'ना हमें

सुनते हैं क़ीमत तुम्हारी लग रही है आज-कल
सब से अच्छे दाम किस के हैं ये बतलाना हमें

ता-कि उस ख़ुश-बख़्त ताजिर को मुबारकबाद दें
और उस के बा'द दिल को भी है समझाना हमें

अजनबी लोगों में हो तुम और इतनी दूर हो
एक उलझन सी रहा करती है रोज़ाना हमें