उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aaj malbus mein hai kaisi thakan ki KHushbu

आज मल्बूस में है कैसी थकन की ख़ुश्बू

آج ملبوس میں ہے کیسی تھکن کی خوشبو

शायर: Parveen Shakir9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आज मल्बूस में है कैसी थकन की ख़ुश्बू
रात भर जागी हुई जैसे दुल्हन की ख़ुश्बू

पैरहन मेरा मगर उस के बदन की ख़ुश्बू
उस की तरतीब है एक एक शिकन की ख़ुश्बू

उड़ के पहुँचेगी जहाँ तक मिरे फ़न की ख़ुश्बू
साथ जाएगी किसी रश्क-ए-चमन की ख़ुश्बू

क़ामत-ए-शे'र की ज़ेबाई का 'आलम मत पूछ
मेहरबाँ जब से है उस सर्व-बदन की ख़ुश्बू

मौजा-ए-गुल को अभी इज़्न-ए-तकल्लुम न मिले
पास आती है किसी नर्म-सुख़न की ख़ुश्बू

'आरिज़-ए-गुल को छुआ था कि धनक सी बिखरी
किस क़दर शोख़ है नन्ही सी किरन की ख़ुश्बू

ज़िक्र शायद किसी ख़ुर्शीद-बदन का भी करे
कू-ब-कू फैली हुई मेरे गहन की ख़ुश्बू

किस ने ज़ंजीर किया है रम-ए-आहू-चश्माँ
निकहत-ए-जाँ है उन्हें दश्त-ओ-दमन की ख़ुश्बू

इस असीरी में भी हर साँस के साथ आती है
सेहन-ए-ज़िंदाँ में उन्हें दश्त-ए-वतन की ख़ुशबू